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Dandi March: महात्मा गांधी के नेतृत्व में 12 मार्च 1930 को शुरु हुई थी दांडी यात्रा, जानें 24 दिनों तक चले इस सत्याग्रह का इतिहास और महत्व


दांडी यात्रा (Photograph Credit: Wikimedia Commons) Dandi March Anniversary: दांडी यात्रा (Dandi March) को नमक सत्याग्रह Salt Satyagraha) और दांडी सत्याग्रह (Dandi Satyagraha) के नाम से भी जाना जाता है. दांडी यात्रा महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)  के नेतृत्व में अहिंसक सविनय अवज्ञा के तहत 12 मार्च 1930 को शुरू हुआ था, जिसका समापन 5 अप्रैल 1930 को हुआ था. यह आंदोलन करीब 24 दिनों तक चला था. सत्याग्रह शब्द संस्कृत के शब्द सत्या (सत्य) और अग्र (आग्रह) से बना है. महात्मा गांधी ने 1882 के ब्रिटिश नमक अधिनियम को सत्याग्रह के पहले लक्ष्य के रूप में चुना था. 24 दिनों तक चली यह पद-यात्रा अहमदाबाद (Ahmedabad) के साबरमती आश्रम (Sabarmati Ashram) से शुरू होकर नवसारी स्थित छोटे से गांव दांडी तक पहुंची थी. महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए प्रमुख आंदोलनों में दांडी यात्रा एक महत्वपूर्ण सत्याग्रह था. दांडी यात्रा का इतिहास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1930 के दशक की शुरुआत में ब्रिटिश शासन से भारतीय संप्रभुता और स्व-शासन जीतने के लिए सत्याग्रह को अपनी मुख्य रणनीति के रूप में चुना. इसके लिए महात्मा गांधी को अभियान के आयोजन के लिए नियुक्त किया गया था. दांडी मार्च 240 मील (390 किमी) तक फैला, दांडी यात्रा साबरमती आश्रम से दांडी तक की गई, जिसे उस समय नवसारी कहा जाता था, जो गुजरात में है. जब 6 अप्रैल 1930 को गांधी जी ने सुबह 6.30 बजे ब्रिटिश राज के नमक कानूनों को तोड़ा तो इसने लाखों भारतीयों द्वारा नमक कानूनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा का कार्य किया. दांडी यात्रा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ओर दुनिया भर का ध्यान आकर्षित किया. नमक कर के खिलाफ सत्याग्रह एक साल तक जारी रहा. नमक सत्याग्रह के कारण 60,000 से अधिक भारतीयों को जेल में डाल दिया गया था. यह भी पढ़ें: Azadi Ka Amrut Mahotsav: साबरमती आश्रम से 12 मार्च को पीएम मोदी करेंगे ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ से जुड़े कार्यक्रमों का उद्घाटन दांडी यात्रा का महत्व दांडी यात्रा नमक पर ब्रिटिश राज के एकाधिकार के खिलाफ एक आंदोलन था. दरअसल, उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत ने चाय, कपड़ा और नमक जैसी चीजों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर रखा था, जिसके चलते भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार प्राप्त नहीं था और भारतीयों को इंग्लैंड से आनेवाले नमक के लिए कई गुना ज्यादा पैसे देने पड़ते थे. अंग्रेजों के इस निर्दयी कानून के खिलाफ गांधीजी के नेतृत्व में हुए दांडी यात्रा में शामिल लोगों ने समुद्र के पानी से नमक बनाने का संकल्प लिया. गांधी ने अपने विश्वसनीय अनुयायियों में से 79 के साथ इस यात्रा की शुरुआत की थी और 240 मील लंबी यात्रा कर दांडी स्थित समुद्र किनारे पहुंचे, जहां उन्होंने सार्वजनिक तौर पर नमक बनाकर अंग्रेजों के नमक कानून को तोड़ा. नमक सत्याग्रह 1920-22 के असहयोग आंदोलन के बाद से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे महत्वपूर्ण संगठित चुनौती थी.


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