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प्यार, सेक्स, कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता! (Love, Sex, Commitment- Changing Concepts Of Relationship)

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प्यार, सेक्स, कमिटमेंट… कितना बदला रिश्ता! (Love, Intercourse, Dedication- Altering Ideas Of Relationship)

एक लफ़्ज़, जिसकी पाकीज़गी को शिद्दत से महसूस किया जाता था… प्यार! एक एहसास, जिसे मुहब्बत के ख़ूबसूरत स्वरूप के रूप में साकार किया जाता था… सेक्स! एक अनकहा साथ, जिसे ताउम्र ही नहीं, सात जन्मों का बंधन कहा जाता था… कमिटमेंट! लेकिन समय के साथ और बदलते परिवेश ने इन तमाम शब्दों की परिकल्पना और हक़ीक़त को पूरी तरह से बदल डाला है. आज के संदर्भ में प्यार का मतलब आकर्षण! आज की तारीख़ में सेक्स का मतलब शारीरिक भूख! आज के युग में कमिटमेंट का मतलबमहज़ बेव़कूफ़ी!

Relationship

बदलते समाज की बदलती तस्वीर...

जी हां, यही सच्चाई है कि रिश्तों को सार्थक व पूर्ण करते इन तीनों शब्दों का अर्थ आज पूरी तरह बदल चुका है. बीते व़क्त की बात करें, तो काफ़ी कुछ सहज था. सबके काम व ज़िम्मेदारियां भी बंटी हुई थीं. रिश्तों को लेकर भी मर्यादा व अनुशासन था. प्यार को पवित्र अर्थों में देखा जाता था. जिससे प्यार किया, उसके साथ ही सेक्स करने की बात सोची जाती थी और उसी के साथ शादी के बंधन में बंधकर ज़िंदगीभर उस रिश्ते को प्यार से निभाने का संकल्प भी लिया जाता था.

लेकिन आज ऐसा नहीं है. प्यार को लोग महज़ आकर्षण समझते हैं, जो तब तक ही निभाया जाता है, जब तक कि यह आकर्षण एक-दूसरे के प्रति बरक़रार रहता है. सेक्स के लिए भी अब कमिटेड रिश्ते में बंधने की ज़रूरत नहीं है. सेक्स तो शरीर की डिमांड है, जब ज़रूरत हो, तब कर लो. अगर पार्टनर साथ नहीं है, तो जो मन को भा जाए, उसके साथ कर लो. यही हाल कमिटमेंट का है कि रिश्ते तो बनाते हैं लोग, पर नो गारंटीवाले रिश्ते. कब तक चलेंगे, कह नहीं सकते.

इन रिश्तों और शब्दों के मायने बदलने के कई कारण हैं…

–     हमारा समाज बदल चुका है और उसी के साथ लोगों की सोच भी.

–     अब लोग कमिटमेंट करना ही नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें ख़ुद नहीं पता होता कि रिश्ता कब तक चलेगा और कितना टिकेगा.

–     लाइफ फास्ट हो गई है और इस बदलती लाइफस्टाइल का सबसे ज़्यादा असर हमारे रिश्तों पर ही पड़ रहा है.

–     पहले एक-दूसरे के लिए पार्टनर्स एडजेस्टमेंट्स करते थे, अपनी चाहतों को छोड़कर पार्टनर की ख़्वाहिश को पूरा करने की कोशिशें करते थे. उसके सपनों में ही अपने ख़्वाबों को साकार होता देखते थे… और यह सब वो ख़ुशी-ख़ुशी करते थे.

–     वहीं अब सभी लोग सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे हैं. अपनी ख़ुशी, अपने सपने, अपनी ख़्वाहिशें… भले ही वो रिश्ते में भी हों, पर वहां भी अपनी-अपनी अलग ज़िंदगी ही जी रहे होते हैं.

–     स्पेस के नाम पर एक तय दूरी बनाए रखते हैं. कोई किसी के फोन को, ईमेल को या लैपटॉप को खोल नहीं सकता.

–     एक-दूसरे के पासवर्ड्स नहीं पता होते. एक-दूसरे के सोशल मीडिया अकाउंट्स के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं पता होता.

–     ऐसे में कमिटमेंट और प्यार की जगह ही कहां बचती है.

–     रही सेक्स की बात, तो अब सेक्स को लेकर भी बहुत कैज़ुअल हो गए हैं. आजकल ज़रूरी नहीं कि पार्टनर के साथ ही सेक्स हो.

–     ज़रूरी नहीं कि शादी के बाद ही सेक्स हो.

–     क्योंकि शादी तक कौन इंतज़ार करे और क्या पता शादी कब और किससे हो?

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Couple Goals

–     ऐसे में सेक्स के एहसास से अछूता क्यों रहा जाए?

–     एक्सपोज़र इतना बढ़ गया है कि आजकल सब कुछ आसानी से उपलब्ध है.

–     बच्चों की परवरिश के तौर-तरी़के भी बदल गए हैं.

–     पैरेंट्स की सोच बदल गई है, तो भला संस्कार भी पहले जैसे कैसे रहेंगे, उनमें भी बदलाव लाज़िमी है.

–     फ्री सेक्स का कॉन्सेप्ट आज की जेनरेशन को ज़्यादा सुविधाजनक लगता है, जिसमें न प्यार की भावनाओं का पहरा और न ही कमिटमेंट का बंधन.

–     भावनाएं और कमिटमेंट में बहनेवालों को आज की तारीख़ में बेव़कूफ़ समझा जाता है और इनसे परे जो लोग हैं, उन्हें स्मार्ट कहा जाता है.

–     ऐसा नहीं है कि स़िर्फ लड़के ही ऐसी सोच रखते हैं, लड़कियां भी इसी तरह की सोच को तवज्जो देती हैं.

–     वो भी प्रैक्टिकल होने और लाइफ के प्रति प्रैक्टिकल अप्रोच रखने में ही ज़्यादा विश्‍वास करती हैं.

–     उनके लिए भी करियर और पैसा, प्यार और कमिटमेंट से ज़्यादा महत्वपूर्ण है. वो रिश्तों में भी भावनाएं नहीं अपनी सुविधाएं ढूंढ़ती हैं.

–     अपनी मर्ज़ी से जीने का शग़ल, न कोई कमिटमेंट, न कोई स्ट्रगल… हां, स्ट्रगल अगर करियर और पैसों के लिए हो, तो कोई बात नहीं, पर रिश्तों के लिए यह वेस्ट ऑफ टाइम है.

–     रिश्ता निभे तो ठीक, वरना उसे लंबे समय तक ढोना समझदारी नहीं.

–     पर रिश्ता निभाने के लिए दोनों ही तरफ़ से कोई अतिरिक्त प्रयास की गुंजाइश आज नहीं है.

–     पहले लड़कियां यह प्रयास करती थीं और आज भी कुछ लोग हैं, जो पूरी तरह प्रैक्टिकल नहीं हुए हैं, पर अब जब लड़कियों के भी प्रयास कम हो गए, तो रिश्तों से प्यार और कमिटमेंट गायब हो गया.

–     लड़कों की ओर से न पहले प्रयास होते थे और न आज ही कोशिशें होती हैं.

–     तो प्यार और कमिटमेंट के बिना अब स़िर्फ सेक्स ही रह गया है, वो भी जब मूड हो और जिसके साथ मूड हो.

–     एक ही पार्टनर के साथ अब सेक्स उबाऊ लगने लगा है. लोग अपनी लाइफ में स्पाइस ऐड करने के लिए शादी के बाहर भी सेक्स करने से परहेज़ नहीं करते.

–     शादी में तो वैसे भी एक्साइटमेंट नहीं रह गया. कुछ समय बाद सब कुछ रूटीन लगने लगता है और फिर उस पर डबल इंकम नो सेक्स का बढ़ता कॉन्सेप्ट, क्योंकि पार्टनर के साथ सेक्स के लिए न टाइम है, न एनर्जी.

–     ऐसे में जब सेक्स का मन हो, तो जो मिले उसके साथ कर लो.

–     ऐसा भी है कि पहले समाज का एक डर और परिवार का बंधन भी था, जो लोगों को मनमानी से रोकता था. यही अनुशासन कहलाता था.

–     पर आज यह डर भी ख़त्म होता जा रहा है, क्योंकि घर, परिवार, पैरेंट्स और समाज ने भी इस बदलाव को कुछ हद तक स्वीकार कर लिया है.

–     यूं भी हर कोई आत्मनिर्भर है, तो वो किसी भी रोक-टोक को अनुशासन न समझकर अपनी निजी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी मानते हैं.

–     सभी का यही कहना होता है कि यह उनकी ज़िंदगी है, चाहे जैसे जीएं.

–     सोशल मीडिया ने भी बहुत हद तक इन रिश्तों और शब्दों के मायनों को बदलने में भूमिका निभाई है. लोग ऑफिस के बाद अब सबसे ज़्यादा यहीं बिज़ी रहते हैं और यहीं सुकून तलाशते हैं. जहां डिजिटल वर्ल्ड और फेक रिश्ते उन्हें ज़्यादा आकर्षित करते हैं. ऐसे में रियल वर्ल्ड के रिश्ते बोरिंग लगने लगते हैं और वहां प्यार और कमिटमेंट की जगह कम ही रह जाती है.

–     ऐसे में प्यार, सेक्स और कमिटमेंट का यह बदलता स्वरूप कुछ समय तक तो यूं ही रहनेवाला है.

यह स्वरूप अब भले ही सुविधाजनक लग रहा होगा, पर भविष्य में इसका ख़ामियाज़ा तो सभी को भुगतना पड़ेगा. जहां कहने को अपना कोई नहीं होगा, ऐसा कोई शख़्स कहीं नज़र नहीं आएगा, जिसके कंधे पर सुकून से सिर रखकर अपने ग़म भुला सकें. व्यावसायिक और ज़िंदगी की चुनौतियों के बीच कभी न कभी तो यह एहसास होगा ही कि कोई ऐसा हो, जिसे अपना कह सकें. जिसके साथ प्यार भी हो, कमिटमेंट भी और सेक्स भी उसी के साथ हो, क्योंकि प्यार और रिश्ते का सही मायनों में भी यही अर्थ होता है, बाकी सब व्यर्थ और अनर्थ ही है.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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